रामायण: जहाँ भोग नहीं, महात्याग की प्रतियोगिता है

रामायण: जहाँ भोग नहीं, महात्याग की प्रतियोगिता है... 😭🙏
हम अक्सर राम जी के वनवास, लक्ष्मण जी की सेवा और भरत जी के त्याग की बात करते हैं। लेकिन अयोध्या में रहकर भी एक भाई ने जो तपस्या की, वह अदृश्य ही रह गई।
यह प्रसंग उस 'चौथे भाई' शत्रुघ्न का है, जो रामायण के मौन तपस्वी हैं।
भगवान को वनवास गए तेरह वर्ष बीत चुके थे। भरत जी नंदीग्राम में तपस्वी का जीवन जी रहे थे और शत्रुघ्न जी उनके आदेश से राज्य संभाल रहे थे।
एक रात, माता कौशल्या को महल की छत पर किसी के चलने की आहट सुनाई दी। जाकर देखा तो सबसे छोटी बहू, श्रुतिकीर्ति जी थीं।

माता ने स्नेह से पूछा, "बेटी, इतनी रात को अकेली छत पर? नींद नहीं आ रही? शत्रुघ्न कहाँ है?"
श्रुति जी की आँखें भर आईं, वे माँ के गले लग गईं और सिसकते हुए बोलीं- "माँ, उन्हें देखे हुए तो तेरह वर्ष हो गए।"
यह सुनकर कौशल्या जी का हृदय विदीर्ण हो गया। एक ही महल में रहकर तेरह वर्षों का वियोग?
उसी आधी रात को पालकी तैयार हुई। माँ कौशल्या शत्रुघ्न को खोजने निकलीं।
और जानते हैं शत्रुघ्न जी कहाँ मिले?
अयोध्या के जिस दरवाजे के बाहर भरत जी नंदीग्राम में तप कर रहे थे, उसी दरवाजे के ठीक भीतर, एक कठोर पत्थर की शिला पर अपनी बाँह का तकिया बनाए शत्रुघ्न सो रहे थे।
माँ सिरहाने बैठ गईं। बालों में हाथ फिराया तो शत्रुघ्न जी हड़बड़ा कर उठे और चरणों में गिर पड़े।
माँ ने रुंधे गले से पूछा, "शत्रुघ्न! तुम यहाँ इस पत्थर पर क्यों?"
शत्रुघ्न जी की रुलाई फूट पड़ी। उन्होंने जो कहा, वह रामायण का सार है:
🥺 "माँ! भैया राम वन में पत्तों की शैया पर सोते हैं, भैया लक्ष्मण उनकी सेवा में रात-दिन जागते हैं, भैया भरत नंदीग्राम में गड्ढे में सोते हैं... तो क्या यह महल, यह राजसी सुख विधाता ने अकेले मेरे ही लिए बनाए हैं?"
माता कौशल्या निरुत्तर रह गईं।

यही रामायण है। यह भोग की नहीं, त्याग की कथा है। यहाँ भाइयों में त्याग की ऐसी अलौकिक प्रतियोगिता है जहाँ सभी प्रथम हैं, कोई पीछे नहीं।
रामायण हमें जीवन जीने की सबसे उत्तम शिक्षा देती है।

।। जय सियाराम ।।

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