परम भागवत राजा अम्बरीष

#भक्त_गाथा_१

                        || परम भागवत राजा अम्बरीष ||

            राजर्षि अम्बरीष बड़े भाग्यवान् थे। वे मनुके प्रपौत्र तथा नाभागके पुत्र थे। पृथ्वीके सातों द्वीप, अचल सम्पत्ति एवं अतुलनीय ऐश्वर्य उनको प्राप्त था। यद्यपि ये सब साधारण मनुष्योंके लिये अत्यन्त दुर्लभ वस्तुएँ हैं, फिर भी वे इन्हें स्वप्नतुल्य समझते थे; क्योंकि वे जानते थे कि जिस धन-वैभवके लोभमें पड़कर मनुष्य घोर नरकमें जाता है, वह केवल चार दिनकी चाँदनी है। भगवान् श्रीकृष्णमें और उनके भक्तोंमें उनका परम प्रेम था। उस प्रेमके प्राप्त हो जानेपर तो यह सम्पूर्ण विश्व और उसकी सारी सम्पत्तियाँ मिट्टीके ढेलेके समान जान पड़ती हैं। अम्बरीषके पैर भगवान्‌के तीर्थोकी पैदल यात्रा करनेमें ही लगे रहते। उन्होंने अपने सारे कर्म सर्वात्मा एवं सर्वान्तरयामी भगवान्‌के प्रति समर्पित कर दिये थे और भगवद्भक्त ब्राह्मणोंकी आज्ञानुसार वे इस पृथ्वीका राज्य करते थे। इनकी प्रजा भी भगवद्भावभावित होकर भगवान्‌के उत्तम चरित्रोंका श्रवण तथा गायन करती। प्रजाजनोंको सांसारिक भोग-सामग्री आकर्षित नहीं कर पाती थी; क्योंकि उनके हृदयमें अनन्त प्रेमका दान करनेवाले श्रीकृष्णके नित्य-निरन्तर दर्शन होते रहते थे। राजा अम्बरीष इस प्रकार तपस्यासे युक्त भक्तियोग तथा प्रजापालनरूप स्वधर्मद्वारा भगवान्‌को प्रसन्न करने लगे और शनैः-शनैः उन्होंने सब प्रकारकी आसक्तियोंका परित्याग कर दिया। उनकी अनन्य भक्तिसे प्रसन्न होकर भगवान्‌ने उनकी रक्षाके लिये सुदर्शन चक्रको नियुक्त कर दिया था, जो विरोधियोंको भय देनेवाला एवं भगवद्भक्तोंका रक्षक है।

            राजा अम्बरीषकी पत्नी भी उन्हींके समान धर्मशील, संसारसे अनासक्त एवं भक्तिपरायण थीं। एक बार उन्होंने अपनी पत्नीके साथ भगवान् श्रीकृष्णकी आराधना करनेके लिये एक वर्षतक द्वादशीप्रधान एकादशी-व्रत करनेका नियम ग्रहण किया। व्रतकी समाप्ति होनेपर कार्तिक महीनेमें उन्होंने तीन रातका उपवास किया और एक दिन पवित्रसलिला यमुनाजीमें स्नान करके मधुवनमें भगवान् श्रीकृष्णकी महाभिषेककी विधिसे समस्त विहित सामग्रियोंके साथ विधिवत् अभिषेक एवं पूजन किया। तत्पश्चात् पहले ब्राह्मणोंको स्वादिष्ट एवं अत्यन्त गुणकारी भोजन कराकर उन लोगोंके घर साठ करोड़ गौएँ सुसज्जित करके भेज दीं। जब ब्राह्मणोंको सब कुछ मिल चुका, तब राजा उन लोगोंसे आज्ञा लेकर व्रतका पारण करनेकी तैयारी करने लगे। उसी समय शाप और वरदान देनेमें समर्थ दुर्वासाजी भी उनके यहाँ अतिथि-रूपमें पधारे।

            राजा अम्बरीष उन्हें देखते ही स्वागतार्थ उठकर खड़े हो गये और यथायोग्य आसन देकर बैठाया। विविध सामग्रियोंसे उनकी पूजा की तथा उनके चरणोंमें प्रणत होकर भोजनके लिये अम्बरीषने प्रार्थना की। दुर्वासाजीने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और आवश्यक कर्मोंसे निवृत्त होनेके लिये यमुनाजीके तटपर गये। स्नान-ध्यान करनेमें समय इतना बीत गया कि द्वादशी केवल घड़ीभर शेष रह गयी। धर्मज्ञ अम्बरीषने धर्मसंकटमें पड़कर ब्राह्मणोंके साथ परामर्श किया और कहा— 'ब्राह्मणो ! श्रुतियोंमें ऐसा कहा गया है कि जल पी लेना, भोजन करना भी है, नहीं भी करना है। इसलिये इस समय केवल जल पीकर पारण किये लेता हूँ।' ऐसा निश्चय करके अम्बरीषने मनमें भगवान्‌का चिन्तन करते हुए जल पी लिया। दुर्वासाजी आवश्यक कर्मोंसे निवृत्त होकर यमुनाजीसे वापस आ गये। जब राजाने आगे बढ़कर उनका अभिनन्दन किया, तो दुर्वासाजीने अनुमानसे ही समझ लिया कि राजाने पारण कर लिया है। वे क्रोधसे थर-थर काँपने लगे। उन्होंने हाथ जोड़कर खड़े अम्बरीषसे डाँटकर कहा— 'अहो ! देखो तो सही, यह कितना क्रूर है, धनके मदमें मतवाला हो रहा है, भगवान्‌की भक्ति तो इसे छूतक नहीं गयी है और यह अपनेको बड़ा समर्थ मानता है। मैं इसका अतिथि होकर आया हूँ, इसने मुझे निमन्त्रण भी दिया है, फिर भी मुझे बिना खिलाये स्वयं खाकर इसने धर्मका उल्लंघन करके कितना बड़ा पाप किया है। अच्छा देख, तुझे अभी इसका फल चखाता हूँ।' यह कहते-कहते उन्होंने अपनी एक जटा उखाड़ी तथा अम्बरीषको मार डालनेके लिये एक कृत्या उत्पन्न की। वह कृत्या आगके समान जलती हुई हाथमें तलवार लेकर राजाके ऊपर टूट पड़ी। राजा अम्बरीष एक पग भी विचलित नहीं हुए। भगवान्‌ने पहलेसे ही उनकी रक्षाके लिये सुदर्शन चक्र नियुक्त कर रखा था, उसने तत्काल कृत्याको जलाकर राखका ढेर कर डाला और दुर्वासाकी तरफ चल पड़ा। सुदर्शन चक्रको अपनी तरफ आते हुए देखकर दुर्वासाजी अपने प्राण बचानेके लिये वहाँसे एकाएक भाग खड़े हुए। जब दुर्वासाजीने देखा कि चक्र तो मेरे पीछे लग गया है, तब सुमेरुपर्वतकी गुफामें प्रवेश करनेके लिये वे उसी ओर दौड़े। दुर्वासाजी दिशा, आकाश, पृथ्वी, अतल-वितल आदि नीचेके लोकों एवं स्वर्गतक गये, परंतु उन्होंने प्रतिक्षण असह्य तेजवाले सुदर्शन चक्रको अपने पीछे लगे देखा। कहीं भी उनकी किसीने रक्षा नहीं की, तब वे अत्यधिक भयभीत हो गये और ब्रह्माजीके पास जाकर बोले— ब्रह्माजी ! आप स्वयम्भू हैं, भगवान्‌के इस तेजोमय चक्रसे मेरी रक्षा कीजिये। ब्रह्माजीने भगवान्‌के भक्तके द्रोहीको बचानेमें अपनी असमर्थता व्यक्त की, तब भगवान्‌के चक्रसे सन्तप्त होकर वे कैलासवासी भगवान् शंकरकी शरणमें गये।

            भगवान् शंकरने भी यह कहकर असमर्थता व्यक्त की कि हम सब भगवान्‌की मायाको नहीं जान सकते । यह चक्र उन्हीं परम पुरुष सर्वेश्वरका अस्त्र है, यह हमलोगोंके लिये असह्य है। तुम उन्हींकी शरणमें जाओ। वहाँसे भी निराश होकर दुर्वासाजी भगवान्‌के परमधाम वैकुण्ठमें गये। वे काँपते हुए भगवान्‌के चरणोंमें गिर पड़े और कहा— 'हे अच्युत ! हे अनन्त ! प्रभो ! मैं अपराधी हूँ, आप मेरी रक्षा कीजिये। आपका परम प्रभाव न जाननेके कारण ही मैंने आपके प्रिय भक्तका अपराध किया है। प्रभो ! आपके नामका उच्चारण करनेमात्रसे ही नारकी जीव भी मुक्त हो जाता है।'

            भगवान्‌ने कहा— दुर्वासाजी ! मैं सर्वथा भक्तोंके अधीन हूँ। मुझमें तनिक भी स्वतन्त्रता नहीं है। मेरे सीधे-सादे सरल भक्तोंने मेरे हृदयको अपने हाथमें कर रखा है। भक्तजन मुझसे प्यार करते हैं और मैं उनसे—

                     अहं भक्तपराधीनो ह्यस्वतन्त्र इव द्विज ।
                     साधुभिर्ग्रस्तहृदयो  भक्तैर्भक्तजनप्रियः ॥

            ब्रह्मन् ! अपने भक्तोंका एकमात्र आश्रय मैं ही हूँ। इसलिये अपने साधुस्वभाव भक्तोंको छोड़कर मैं न तो अपने आपको चाहता हूँ और न अपनी भार्या विनाशरहित लक्ष्मीको। जो भक्त स्त्री, पुत्र, गृह, गुरुजन, प्राण, धन, इहलोक और परलोक-सबको छोड़कर केवल मेरी शरणमें आ गये हैं, उन्हें छोड़नेका संकल्प भी मैं कैसे कर सकता हूँ ? जैसे सती स्त्री अपने पातिव्रत्यसे सदाचारी पतिको वशमें कर लेती है, वैसे ही मेरे साथ अपने हृदयको प्रेम-बन्धनसे बाँध रखनेवाले समदर्शी साधु भक्तिके द्वारा मुझे अपने वशमें कर लेते हैं। मेरे अनन्य प्रेमी भक्त सेवासे ही अपनेको परिपूर्ण-कृतकृत्य मानते हैं। मेरी सेवाके फलस्वरूप जब उन्हें सालोक्य, सारूप्य आदि मुक्तियाँ प्राप्त होती हैं, तब वे उन्हें भी स्वीकार करना नहीं चाहते, फिर समयके फेरसे नष्ट हो जानेवाली वस्तुओंकी तो बात ही क्या है। दुर्वासाजी ! मैं आपसे और क्या कहूँ, मेरे प्रेमी भक्त तो मेरे हृदय हैं और उन प्रेमी भक्तोंका हृदय मैं स्वयं हूँ। वे मेरे अतिरिक्त और कुछ भी नहीं जानते तथा मैं उनके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं जानता—

                 साधवो  हृदयं  मह्यं  साधूनां  हृदयं  त्वहम् ।
                 मदन्यत् ते न जानन्ति नाहं तेभ्यो मनागपि ॥

            दुर्वासाजी ! इसमें सन्देह नहीं कि ब्राह्मणोंके लिये तपस्या और विद्या परम कल्याणके साधन हैं, परंतु ब्राह्मण यदि उद्दण्ड और असभ्य हो जाय, तो वे ही दोनों उलटा फल देने लगते हैं। सुनिये, मैं आपको एक उपाय बताता हूँ। जिसका अनिष्ट करनेसे आपको इस विपत्तिमें पड़ना पड़ा है, आप उसी नाभागनन्दन परम भाग्यशाली राजा अम्बरीषके पास जाइये और उनसे क्षमा माँगिये, तब आपको शान्ति मिलेगी।

            भगवान्‌की आज्ञानुसार दुर्वासाजी सुदर्शन चक्रकी ज्वालासे जलते हुए राजा अम्बरीषके पास आये और अत्यन्त दुखी होकर राजाके पैर पकड़ लिये। इससे राजा बहुत लज्जित हो गये और दुखी होकर सुदर्शन चक्रकी स्तुति करने लगे और कहा— यदि मैंने कुछ भी दान किया हो, यज्ञ किया हो अथवा अपने धर्मका पालन किया हो, यदि हमारे वंशके लोग ब्राह्मणोंको ही अपना आराध्यदेव समझते रहे हों, भगवान् समस्त गुणोंके एकमात्र आश्रय हैं, यदि मैंने समस्त प्राणियोंके आत्माके रूपमें उन्हें देखा हो और वे मुझपर प्रसन्न हों, तो दुर्वासाजीके हृदयकी सारी जलन मिट जाय।

            इस प्रकार अम्बरीषकी स्तुतिसे सुदर्शन चक्र शान्त हो गया और दुर्वासाजीकी जलन भी शान्त हो गयी। उन्होंने अम्बरीषको अनेकानेक उत्तम आशीर्वाद देते हुए उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की और उनसे अनुमति लेकर आकाशमार्गसे उस ब्रह्मलोककी यात्रा की, जो केवल निष्काम कर्मसे ही प्राप्त होता है। जब चक्रसे भयभीत होकर दुर्वासाजी भागे थे, तबसे लेकर उनके लौटनेतक एक वर्षका समय बीत गया था। इतने दिनोंतक राजा अम्बरीष उनके दर्शनकी आकांक्षासे केवल जल पीकर ही रहे। ऐसा था परम पुनीत उदात्त चरित्र परम भागवत राजा अम्बरीषका !
                                                 श्रीमद्भागवत-महापुराण

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               ❀༺꧁||🙏जय माँ🙏||꧂༻❀

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