क्या_आप_बंदी_छोड़_दिवस_जानते_है
#क्या_आप_बंदी_छोड़_दिवस_जानते_है?
दोस्तो, जैसा कि आप सभी जानते ही है कि सारे भारत वर्ष में अनेक महत्वपूर्ण दिवस मनाए जाते है, आज हम आपको इसी नवम्बर माह मे मनाए गए सिख पंथ के ऐसे ऐतिहासिक दिवस के बारे में बताने जा रहे है जिसे जानने के बाद आप छठे नानक धन श्री गुरू हरगोबिंद साहिब जी के चरणों में एक बार नतमस्तक जरूर हो जायेगें।
दोस्तो, सनातन धर्म में जहां दिवाली पर्व का बहुत महत्त्व है, वहीं सिख पंथ में भी इस दिन का बहुत महत्व है। यह दिवस सिख पंथ में 'बंदी छोड़ दिवस' के रूप में मनाया जाता है।
'बंदी छोड़ दिवस' हमारे राष्ट्र और समाज की एकता को मजबूती देने वाला त्योहार है, परन्तु कितने लोगों को इसकी जानकारी है?
इतिहासकारों के मुताबिक क्रूर मुगलों ने जब मध्य प्रदेश के ग्वालियर के किले को अपने कब्जे में लिया तो इसे कारावास में तबदील कर दिया। इस किले में क्रूर मुगल सल्तनत के लिए खतरा माने जाने वाले लोगों को कैद करके रखा जाता था।
बात सोलहवीं शताब्दी के शुरुआत की है। दिल्ली की गद्दी पर मुगल बादशाह जहांगीर बैठा था। यह वो दौर था जब मुगलों का अत्याचार अपने चरम की ओर बढ़ रहा था। कहते है कि जब गुरु हरगोबिंद जी के नेतृत्व में सिख पंथ के वीरों ने मुगलों की क्रूरता के खिलाफ बगावत करना शुरू किया तो क्रूर बादशाह जहांगीर ने गुरु हरगोबिंद जी को जब कैद किया गया,उनके साथ साथ 52 हिन्दू राजाओ को भी ग्वालियर के किले में बंदी बनाकर कैद में डाल दिया।
सिख धर्म के बढ़ते प्रभाव से चिंतित जहांगीर ने सिखों के छठवें गुरु हरगोबिंद साहिब जी को बंदी बनाकर ग्वालियर के किले में कैद कर दिया।
मुगलों ने ग्वालियर के किले पर कब्जा करने के बाद इसे जेल में परिवर्तित कर दिया था। मुगल सल्तनत के लिए खतरा माने जाने वालों को वहां कैद करके रखा जाता था। गुरुजी दो वर्ष कैद में रहे।
गुरु साहिब के रिहा होने की बड़ी रोचक कहानी है, कहते हैं कि जब से गुरु हरगोबिंद साहिब को गिरफ्तार किया गया था, तब से जहांगीर बहुत बीमार पड़ गया बहुत इलाज कराया, परन्तु ठीक नहीं हुआ। बादशाह के काजी का कहना था कि वह बीमार इसलिए पड़ गया क्योंकि उसने एक सचे गुरु को कैद कर लिया है।
एक दूसरी मान्यता के अनुसार जहांगीर को सपने में एक फकीर गुरु हरगोबिंद जी को छोड़ देने के लिए लगातार निर्देश देता था उसने इसका जिक्र एक फकीर से किया, फकीर ने गुरुजी को तत्काल रिहा करने की सलाह दी।
जहांगीर ने गुरु साहिब को रिहा करने के आदेश दे दिए परन्तु गुरु साहिब ने कहा कि वहाँ कैद सभी 52 राजाओं को भी रिहा किया जाए, अन्यथा वे जेल से बाहर नहीं जाएंगे।
जहांगीर को उन सभी राजाओं को रिहा करना अपनी सल्तनत के लिए खतरनाक लग रहा था। इसलिए उसने एक शर्त रख दी कि जितने राजा गुरु का दामन थाम कर बाहर आ सकेंगे, उनको रिहा कर दिया जायेगा।
कहते हैं कि गुरु साहब ने भाई हरिदास के माध्यम से ऐसा चोला तैयार करवाया जिसमें 52 कलियाँ हों। हर एक राजा ने उनके चोले की एक कली पकड़ी और किले से बाहर आ गए। जहांगीर को उन सभी राजाओं को रिहा करना पड़ा। इस रिहाई वाले दिन को बंदी छोड़ दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह दिन कार्तिक अमावस्या अर्थात् दीपावली का दिन था। 'बंदी छोड़ दिवस' हिन्दू-सिख एकता और भाईचारे का अनुपम उदाहरण है। यह पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व भी है। इस घटना के कारण गुरु हरगोबिंद जी को 'बंदी छोड़ दाता' भी कहा जाता है। गुरुजी जब अमृतसर पहुँचे तो पूरे गुरुद्वारे में दीप जलाकर गुरुजी का स्वागत किया गया।
प्रश्न उठता है कि ऐसे सामाजिक एकता और सौहार्द्र के अवसर की जानकारी पाठ्यक्रम में शामिल क्यों नहीं की गई ?
हर हिन्दू को इस 'बंदी छोड़ दिवस' की जानकारी अवश्य होनी चाहिए, साथ ही सिख गुरुओं के प्रति कृतज्ञता का भाव भी।
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